/दो शक्तियां माता के रूप में करती है इस नगर की सुरक्षा, शराब की धार से माता को लगता है महाष्टमी पर भोग नगर पूजन की विशेष परंपरा

दो शक्तियां माता के रूप में करती है इस नगर की सुरक्षा, शराब की धार से माता को लगता है महाष्टमी पर भोग नगर पूजन की विशेष परंपरा

उज्जैन | राजाधिराज महाकालेश्वर की नगरी और राजा विक्रमादित्य की राजधानी अवंतिका जनपद अर्थात उज्जैन का पौराणिक महत्त्व सर्वविदित है | पुराणों में उज्जैन के प्रसिद्द चौबीस खम्बा का विवरण भी आता है | जानकारी के अनुसार महाकाल वन क्षेत्र के प्रमुख द्वार के रूप में चौबीस खम्बा माता नगर के द्वार पर विद्यमान है जो सम्पूर्ण नगर की सुरक्षा व्यवस्था के लिए यहाँ प्रकट हुई |
महाकाल वन क्षेत्र के बाहर की ओर जाने वाले मार्ग पर एक विशाल द्वार का अवशेष दिखाई पड़ता है। इसे चौबीस खम्बा दरवाजा कहते हैं। इसे विक्रमादित्य द्वार भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाकाल के मन्दिर में प्रवेश का यही द्वार रहा होगा। प्राचीनकाल में महाकाल-वन एक बड़े परकोटे से घिरा हुआ था। द्वार से लगा हुआ कोट का हिस्सा गिर चुका है तथा अब केवल द्वार का अवशेष ही बाकी है। जहां दो माताएं शक्ति के रूप में नगर सुरक्षा के लिए विराजमान है | माता महामाया और महालया रूप में ये शक्तियां यहाँ नगर सुरक्षा करती है | इनके भोग में यहाँ हर साल आश्विन मास की नवरात्रि की महाष्टमी को परम्परागत शासकीय रूप से पुरे नगर की करीब 27 किलोमीटर की यात्रा कर मदिरा की धार चढ़ाई जाती है | जो पौराणिक काल से अवंतिका तीर्थ नगरी की परंपरा रही है |
पुरातात्विक महत्त्व
चौबीस खम्बा मंदिर एक भव्य स्थल है जिसका निर्माण 9वी और 10वी शताब्दी ईस्वी में हुआ । यहाँ पर 12 वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा हुआ था उसमें लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवन्ति में व्यापार करने के लिए नागर व चतुर्वेदी व्यापारियों को यहाँ लाकर बसाया था। इस मंदिर के आलिशान प्रवेश द्वार महाकाल वन की और खुलते हैं । प्रवेश द्वार पर दो देविओं की छवि बनी हुई है जिनके नाम उनके पैरों के नीचे खुदे हुए हैं । चौबीसखंबा माता मंदिर पुरात्तव विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक है । यह मंदिर करीब 1000 वर्ष पुराना होकर परमारकालीन स्थापत्य कला तथा द्वार परंपरा का उत्कृष्ट उदारहण है । कभी यह महाकाल वन का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है । अब कालांतर में यह नगर के मध्य विराजित है। मंदिर के समीप पटनी बज़ार तथा सराफा बाजार जैसे प्रमुख बज़ार है। जिससे बड़े व छोटे कारोबारी जुड़े हुए है ।

महाकाल वन के मुख्य प्रवेश द्वार पर दो प्रमुख देवियों के रूप में विराजित माता महामाया व माता महालया चौबीस खंबा माता के नाम से प्रसिद्ध है । तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध उज्जयिनी के चारों द्वार पर भैरव तथा देवी विराजित है, जो आपदा-विपदा से नगर की रक्षा करते है चौबीसखंबा माता उनमे से एक है । इसके अलावा विराजमान हैं बत्तीस पु‍तलियां। किवदंती है कि यहां पर रोज एक राजा बनता था और उससे ये प्रश्न पूछती थीं। | जब राजा विक्रमादित्य का नंबर आया तो उन्होंने अष्टमी के दिन नगर पूजा चढ़ाई। नगर पूजा में राजा को वरदान मिला था कि बत्तीस पुतली जब तुमसे जवाब मांगेंगी तो तुम उन्हें जवाब दे पाओगे। जब राजा ने सभी पुतलियों को जवाब दे दिया तो पुतलियों ने भी वरदान दिया कि राजा जब भी तू न्याय करेगा तब तेरा न्याय डिगने नहीं दिया जाएगा।
माता महामाया और महालया के रूप में दो देवियों को नगर की सुरक्षा करने वाली देवियां भी कहा जाता है।
वही प्राचीन परंपरा के अनुसार प्रति वर्ष शारदीय नवरात्री की महाष्टमी पर कलेक्टर दोनों देवियों को मदिरा का भोग लगाकर शासकीय पूजा करते है । इसके बाद नगर के अन्य देवी व भैरव मंदिर में पूजा होती है । मान्यता है की इस पूजन के माध्यम दोनों देवियाँ नगर की सुरक्षा करती है |
(बॉक्स)
नगर सुरक्षा के लिए शराब की धार 27 किलोमीटर की परिशी में डाली जाती है इस बीच 42 प्राचीन मंदिरों का पूजन होता है जिसमे माताओं और भैरव के मंदिर शामिल होते है | इन सभी का पारंपरिक और औरानिक महत्त्व के अनुसार श्रृंगार किया जाता है और भोग के रूप में पूडी,भजिया, गुलगुले,मालपुए,चने का भोग लगाया जाता है | यात्रा शुरू करने के पहले चौबीस खम्बा माता पर मराठा काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार नारियल का भव्य तोरण बांधा जाता है | एक मटकी में शराब भर कर महाकाल वन की परिक्रमा कर माता से नगर की सुरक्षा की कामना की जाती है | यह परंपरा आज भी यहाँ विद्यमान है |